Environmental Education

Class: B.Ed lV Sem
Compiled by: Asst.Prof. Rashmi Gautam

Topic : Environmental Education, Ecology, Ecosystem

पर्यावरणीय शिक्षा एवं अवधारणा

पर्यावरणीय शिक्षा-विद्यालयीय पाठ्यक्रम में 'पर्यावरण या सामाजिक अध्ययन' विषय
का समावेश एक अद्यतन घटना है। यद्यपि संयुक्त राज्य अमेरिका में 1892 में 'Social Studies' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया तथा 1961 में इसे एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकार किया गया तथापि भारत में माध्यमिक शिक्षा आयोग 1953 के प्रतिवेदन के बाद से ही इसे माध्यमिक शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य विषय के रूप में स्थान दिए जाने के उपक्रम आरंभ हो सके। 10+2 नवीन शिक्षा योजना के अन्तर्गत दस वर्षीय विद्यालय पाठ्यक्रम में अब इसे देश में सर्वत्र समाविष्ट किया गया है। गत तीन दशकों में सामाजिक अध्ययन को पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग बनाये जाने के संबंध में जो कुछ भी प्रयास हुए हैं, वे इसके सम्प्रत्यय (Concept) को ठीक से न समझ पाने के कारण प्रभावहीन एवं निरर्थक सिद्ध हुए हैं। अतः यदि सामाजिक अध्ययन विषय को शिक्षा के नवीन परिवर्तित लक्ष्यों की प्राप्ति में प्रभावी बनाना है तो इसकी अवधारणा को भली-भाँति समझना वांछनीय है। प्रस्तुत अध्याय में इसी संदर्भ में अध्ययन किया जा रहा है।

पर्यावरण अध्ययन की अवधारणा - "पर्यावरणीय अध्ययन के सम्प्रत्यय/अवधारणा का उद्गमएवं विकास" ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाए तो, जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है। "सामाजिक अध्ययन" को विद्यालयीय पाठ्य-क्रम में एक विषय के रूप में मान्यता हाल की ही घटना है। सामाजिक अध्ययन के सम्प्रत्यय के उद्‌गम के बीज 1892 से खोजे जा सकते हैं, जब संयुक्त राज्य अमेरिका की Medicine Wisconsin Conference द्वारा 'सोशल स्टडीज' (Social studies) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया। एम. पी. माफेट (M.P. Moffat) का कथन हैं- "इतिहास, अर्थशास्त्र आदि विषयों के लिए एक समूह का नाम "सामाजिक अध्ययन" रखा गया है।

अमेरिका के शिक्षाविद् जॉन डिवी (John Dewey) एवं डब्लू. एच. किलपैट्रिक (W.H.
Kilpatrick) के 'ज्ञान के एकीकरण' (Integration of knowledge) सिद्धांत तथा किसी क्रियाकलाप (Activity) से संबद्ध कर विषयों को सह-संबंधित रूप में पढ़ाने की शिक्षण-विधि को "सामाजिक अध्ययन" विषय की इस नवीन संकल्पना से मान्यता मिली। 1893 में अमेरिका के "राष्ट्रीय शिक्षा संगठन" (National Education Association) ने इस नाम के विषय का उल्लेख किया। इसके बाद 1911 तक इस विषय का उल्लेख किया जाता रहा तथा इस विषय में नागरिक शास्त्र, समाजशास्त्र आदि विषयों का समावेश भी किया जाने लगा, किन्तु औपचारिक रूप से 1916 में ही अमेरिका के 'माध्यमिक शिक्षा को पुनर्गठित करने वाले आयोग' ने इस विषय को पाठ्यक्रम में स्वीकार किया। इस आयोग ने इस विषय के अन्तर्गत जनतांत्रिक आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं को स्थान दिए गये।
इस प्रकार "सामाजिक ज्ञान" विषय का उद्गम सर्वप्रथम अमेरिका में हुआ तथा बाद में इसका सर्वत्र प्रतिपादन होता रहा।

पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषा


पर्यावरण का अर्थ- 'पर्यावरण' शब्द दो शब्दों परि + आवरण के योग से निर्मित है जिसका तात्पर्य हैं, हमारे चारों ओर का'प्राकृतिक, भौतिक व सामाजिक आवरण या परिवेश। अंग्रेजी के समानार्थक शब्द "Environment" भी दो शब्दों 'Environ एवं Ment' के योग से बना है जिसका अर्थ क्रमशः 'घेरना' (To encircle) तथा 'चारों ओर से' (From all sides) होता है अर्थात् जो तत्व चारों ओर से हमें घेरे हुए हैं वही हमारा (Environment) है।

परिभाषाएँ -

हर्सकोविट्स (Herskovites) के अनुसार - "पर्यावरण सम्पूर्ण बाह्य परिस्थितियों और उसका जीवधारियों पर पड़ने वाला प्रभाव है जो जैव जगत के विकास चक्र का नियामक है।"

फिटिंग (Fitting) के अनुसार- "प्राणियों के पारिस्थितिकीय (Ecological) कारकों का समस्त योग ही पर्यावरण है।"

बेवस्टर (Webster) शब्दकोश के अनुसार - "पर्यावरण से आशय उन घेरे में रहने वाली

परिस्थितियों, प्रभावों और शक्तियों से हैं जो सामाजिक और सांस्कृतिक दशाओं के समूह द्वारा व्यक्ति और समुदाय के जीवन को प्रभावित करती हैं।"

उपरोक्त परिभाषाओं से पर्यावरण के अर्थ एवं अवधारणा में निम्नांकित तत्व समाविष्ट है-(1) पर्यावरण अनेक तत्वों का समूह है जिसका आशय उन समस्त प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा भौतिक परिस्थितियों से हैं जो मानव को चारों ओर से न केवल घेरे रहती हैं वरन्

उसके जीवन को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित करती हैं और स्वयं भी मानव द्वारा प्रभावित होती है।

(2) पर्यावरण के अवयवों में प्रमुख हैं-

(i) भू-मण्डल (Lithosphere), (ii) वायुमण्डल (Atmosphere), (iii) जलमण्डल (Hydrosphere), (iv) जैव-मण्डल (Biosphere), (v) संस्कृति (Culture) |

(3) उपरोक्त अवयव या अन्तःआश्रित या अन्तर्निभर (Interdependent) होते हैं जो परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तथा एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं।

(4) पर्यावरण के दो प्रकार होते हैं- (i) जैविक पर्यावरण (Biotic Environment) तथा (ii) अजैविक पर्यावरण (Abiotic Environment) |

(5) मानव सभ्यता एवं संस्कृति का विकास मानव और पर्यावरण के समयानुकूलन एवं सामंजस्य का परिणाम है।

(6) उपरोक्त अनुकूलन व सामंजस्य में जैसे ही व्यक्तिक्रम आता है प्रगति और विकास अवरुद्ध हो जाता है तथा समस्त जीव जगत् के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो जाता है।

इस प्रकार पर्यावरण बोध मानव में जाग्रत एवं विकसित करने की अधिक आवश्यकता है। यह बोध पर्यावरणीय अध्ययन या शिक्षा द्वारा ही संभव है।

# पर्यावरण शिक्षा के प्रमुख सिद्धांत :

1.पर्यावरण शिक्षा का मकसद लोगों में पर्यावरण नैतिकता विकसित करना है.

2.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को पर्यावरण की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदारियों के बारे में पता चलता है.

3.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को पर्यावरण और उससे जुड़ी समस्याओं के प्रति जागरूकता पैदा होती है.

4.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए ज्ञान, कौशल, और प्रेरणा मिलती है.

5.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को पर्यावरण की समस्याओं के समाधान और नई समस्याओं को रोकने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से काम करने का तरीका सिखाया जाता है.

6.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को जीवन और पर्यावरण की जैव विविधता के संरक्षण का महत्व सिखाया जाता है.

7.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को वातावरण में अपनी भूमिका को समझने में मदद मिलती है.

8.पर्यावरण शिक्षा से लोगों को भविष्य की आपदाओं से बचने के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधनों के साथ जीना सीखने में मदद मिलती है.

पारिस्थितिकी अर्थ एवं परिभाषा

पारिस्थितिकी जीवों के बीच अंतःक्रियाओं का अध्ययन है

परिभाषा ←

अर्नेस्ट हेकेल ने 1869 में कहा था -"पारिस्थितिकी शब्द का पहली बार प्रयोग अर्नेस्ट हेकेल ने 1869 में किया था"

एक अन्य परिभाषा के अनुसार, किसी जीव और उसके पर्यावरण के बीच संबंधों और पृथ्वी पर जानवरों और पौधों के वितरण के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहा जाता है।

पारिस्थितिकी की मूलभूत संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. सभी जीव-जन्तुओं तथा उनके पर्यावरण में पारस्परिक प्रतिक्रियाएँ होती  रहती है और वे विभिन्न ढांगो से एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।

2. पर्यावरण बहुत से अन्तर्सम्बन्धित कारकों की जटिल तथा गतिशील प्रक्रिया है। अर्थात् पर्यावरण समय के साथ बदलता रहता है।

3.जन्तुओं की जातियाँ अपनी संरचना, प्रक्रम, प्रजनन, वृद्धि तथा विकास के संरक्षण के लिए हरसम्भव प्रयास करती हैं।

4. केवल पर्यावरण ही जन्तुओं को प्रभावित नहीं करता, बल्कि जन्तु भी पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।

5. क्लीमेन्ट्स तथा शैल्फर्ड (Clements and Shelford) ने जीवोम (Biome) की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए बताया कि सभी प्रकार के पौधे तथा जन्तु पर्यावरण पर क्रिया तथा प्रतिक्रिया द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। उनके अनुसार समान जलवायु में विभिन्न प्रकार के समुदाय पनप सकते हैं।

6. प्रत्येक जीव एक विशिष्ट स्थान चुनता है। यह उन जीवों के सन्दर्भ में अद्वितीय होता है, जिनके साथ में वह अन्तक्रिया करता है।

7. विभिन्न जीवों के मध्य में अन्तर्क्रिया की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है।

8. पारिस्थितिकी तन्त्र के रासायनिक घटक विशेष चक्र में गतिशील होते हैं। इन्हें जैव रासायनिक चक्र (Biochemical Cycles) कहते हैं।

9. किसी भी जीव समुदाय की सफलतापूर्वक वृद्धि की सीमा निर्धारित होती है। पारिस्थितिकीय कारकों के न्यूनतम तथा अधिकतम रहन स्तर, समय, भौगोलिक स्थिति तथा संख्या आयु के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं।

10. मनुष्य की क्रियाओं द्वारा पारिस्थितिकी मण्डल के शोषण से पारिस्थितिकी मण्डल का सन्तुलन बिगड़ जाता है। इससे विकास की गति धीमी पड़ जाती है और पारिस्थितिकी मण्डल के स्थायित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

इकोतंत्र या पारिस्थितिक तंत्र का अर्थ (Meaning of Ecosystem)

इकोतंत्र या पारिस्थितिक तंत्र एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं। अंग्रेजी भाषा में इसे ही एकोसिस्टम (Ecosystem शब्द के रूप में प्रयुक्त किया गया है। इस शब्द की विस्तृत व्याख्या सर्वप्रथम सन् 1935 में जर्मन वनस्पतिशास्त्रीजी (A.G. Tansley) ने की थी।


तांसले (Tansley) के अनुसार, पारिस्थितिक तंत्र भौतिक तंत्रों का एक विशिष्ट प्रकार है और इसकी रचना (living) तथा अजैविक (non-living) घटकों (components) से होती है। यह अपेक्षाकृत स्थिर, समस्थिति में होते है यह खुला (Open) तंत्र है तथा विभिन्न आकार एवं प्रकार का होता है।"

मांकहाउस तथा समाल के अनुसार, "पारिस्थितिकीय तंत्र भौतिक पर्यावरण अथवा निवास्य क्षेत्र में पौधों और का समूह है।"

पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार (Types of Ecosystem)

पारिस्थितिक तंत्र में प्रकृति और जीव मुख्य तत्व हैं। जीवों में मनुष्य ने तकनीकी विकास से पारिस्थितिक तंत्र की कार्यकुशलता को जहाँ एक ओर बढ़ाया है, तो दूसरी ओर उसे घटाया भी है। अतः इसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ) प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र,

(ब) कृत्रिम या मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र।

(अ) प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Natural Ecosystem)

इसका समस्त संचालन प्रकृति से होता है और जैविक घटकों का उद्भव, विकास, विनाश, स्थानीय या क्षेत्रीय आधार पर प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों से नियंत्रित होता है। जहाँ जैव उद्भव, विकास एवं समस्त चक्रण (पोषण, जल, कार्बन, रसायन चक्र आदि) और अनुक्रमण बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के चलते रहते हैं, उस इकाई को प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं। पर्यावरणीय विशेषताओं के आधार पर इसे निम्नलिखित उप-विभागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) स्थलीय या पार्थिक पारिस्थितिक तंत्र (Terrestrial ecosystem) - स्थल पर पाए जाने वाले पारिस्थितिक तंत्र; जैसे-पर्वत, पठार, वन क्षेत्र, घास के मैदान, मरुस्थल आदि इसमें सम्मिलित हैं।

(2) जलीय पारिस्थितिक तंत्र (Aquatic ecosystem) - जल में पाए जाने वाले पारिस्थितिक तंत्र; जैसे-नदी, तालाब, समुद्र आदि इसमें सम्मिलित है। जल के मीठेपन व खारेपन के आधार पर इन्हें पुनः दो भागों में विभक्त किया जाता है-

(i) स्वच्छ जलीय पारिस्थितिक तंत्र (Freshwater ecosystem)- इसमें स्वच्छ अथवा मीठे जल में पाए जाने वाले परिस्थितिक तंत्र आते हैं। स्वच्छ जल भी दो अवस्थाओं में पाया जाता है- प्रवाहित अथवा बहता हुआ (lotic) तथा स्थिर अथवा ठहरा हुआ (lentic), बहते हुए जल में नदी, धारा, झरना तथा स्थिर जल में तालाब, झील, तलैया आदि पारिस्थितिक तंत्र आते हैं।

(i) सागरीय (खारा) जल पारिस्थितिक तंत्र (Marine water ecosystem)- इसमें खारे जल में पाए जाने वाले पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं: जैसे- महासागर, सागर, नदी, मुहाना, प्रवाल भित्ति, समुद्र तट आदि ।
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